भारत में भक्ति के रूप में देवी की आराधना की जाती रही है| एक जमाना था जब देवी की शक्तिदायानी के रूप में पूजा कर शक्ति हासिल की जाती थी, क्योंकि उन दिनों शारीरिक शक्ति की आवश्यकता अधिक होती थी लेकिन आज भौतिक युग में शक्ति की बजाय संतोष की आवश्यकता होती है, इसलिए संतोषी माता की पूजा करते है | संतोषी माता के पिता गणेश है | राजस्थान में ऐतिहासिक नगर जोधपुर ( मारवाड़ ) की उत्तर दिशा में प्राचीन मण्डोर के मार्ग पर नई खाद्यान मण्डी के मध्य से होते हुवे पहाडों के बीच लाल सागर नामक एक अति रमणीक सरोवर है |
इस भूमि पर मनोकामना पूर्ण करने वाली श्री संतोषी माता का प्राकृतिक प्राचीन मन्दिर है, जिसके आस - पास नीम, पीपल, वाट वृक्ष व कई प्रकार के वृक्ष दृष्टिगोचर होते है | भारत में प्रथम श्रेंणी का युगों पुराना प्राकृतिक तीर्थ है जो अपने आप में एक अदभुत विशेषता लिए हुये है | श्री संतोषी माँ के मन्दिर के ऊपर पहाड़ी ऐसी छाई हुई है| मानो शेषनाग मातेश्वरी पर अपने फण से छाया कर रहा है | इसी पहाड़ी के अन्दर ऊपर भाग में मातेश्वरी व सिंह का पदचिन्ह प्राकृतिक बना हुआ है |
मन्दिर के सन्निकट एक अमृत कुण्ड है, जिसके ऊपर कई वर्षो से एक ही आकार में हरा भरा वृक्ष है, जिसके पास से मनोहर झरना बहता है, जहाँ पर भोलेनाथ की प्रतिमा विराजमान है | अनेक भक्तो की मनोकामना पूर्ण होने के फलस्वरूप आज मन्दिर विशालता को प्राप्त हो रहा है |

व्रत विधि

संतोषी माता के पिता गणेश है एवं माता रिद्धी - सिद्धि हैं, धन, सोना - चाँदी, मोती मूंगा रत्नों से भरा परिवार है | गणपति देव की कमाई, गणपति ने बढाई, सवाई, धन्धे में बरकत, ......

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व्रत कथा

एक बुढिया थी जिसके सात बेटे थे | उनमे से छ कमाते थे और एक न कमाने वाला था | वह बुढिया उन छओं को अच्छी रसोई बनाकर बड़े प्रेम से खिलाती पर सातवें को .....

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उद्यापन की विधि

व्रत के उद्यापन में अढाई सेर खाजा ( मोमनदार पूरी ), खीर, चने का साग नैवेध रखे एवं घी का दीपक जलाकर प्रगट संतोषी माता की जय जयकार बोलकर नारियल तोडे | ....

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एक भक्त की सेवा

धर्म प्रिय सज्जन श्री चुन्नीलाल जी माली सांखला की धर्म पत्नी छोटाबाई चांदपोल, विद्याशाला, जोधपुर निवासी के श्री उदारामजी पुत्र रत्न में उदित हुये | माता - पिता धार्मिक प्रवृति ....

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